Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
तत्तदर्थक्रियाकारि दुःखाय च सुखाय च ।
उदेति भावनं तस्माद्भावनाभावनं जयः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
यही सूचित करने के लिए श्लोक में असदपि” कहा गया है।
इसीलिए शास्त्रीय भी अनात्मविषयक भावना का अभ्यास दुःखमिश्रित खुख के लिए ही होता है;
अतः सर्वविध भावनाओं का उच्छेद कर देना ही आत्यन्तिक अनर्थ को जीत लेना है, न कि बीच की
देवतात्व की प्राप्ति, इस आशय से कहते हैं।
देवता शरीर और उनके भोग आदिरूप अर्थक्रिया के जनक अनात्मचिन्तन दुःख और सुख के लिए
ही उदित होते है । अतः भावना की अभावना करना ही सम्पूर्ण अनर्थो पर विजय पाना है