Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
भावना प्रेक्ष्यमाणैषा न किंचिदिह शिष्यते ।
न च विद्यत एवेति तद्भ्रमेणालमस्तु नः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
वह एकमात्र तत्त्वदर्शन से भलीभाँति छिन्न हो जाती है, यह कहते है।
यह भावना तत्त्वदृष्टि से भलीभाँति देखी जाने पर यहाँ पर कुछ भी नहीं शेष रहती । अथवा उसका
छेदन भी साध्य नहीं, क्योकि असत् का सर्वदा उच्छेद हुआ ही हे, यह कहते है । अथवा वह कुछ है ही
नहीं, अतः उस प्रकार भ्रम करना हमें उचित नहीं है