Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
भ्रमस्य जागतस्यास्य जातस्याकाशवर्णवत् ।
असंवेदनमात्रैकं मार्जनायालमस्तु नः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश के वर्ण के समान उत्पन्न इस
जगत्सम्बन्धी हम लोगों के भरम के परिमार्जन के लिए एकमात्र असंवेदन ही पर्याप्त होगा