Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 64, Verses 16–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 64, verses 16–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 16-21
संस्कृत श्लोक
सर्वं सर्वत्र पश्यन्ति ते यतः शंकरादयः ।
इदमग्रगतं वस्तु तथा संकल्पितं मया ॥ १६ ॥
नाप्यं यतोभयभ्रशं स प्राप्नोत्युभयाश्रयात् ।
सर्वं ह्यभिमतं कार्यमेकनिष्ठस्य सिद्ध्यति ॥ १७ ॥
दक्षिणां ककुभं गच्छन्कः प्राप्नोत्युत्तरां दिशम् ।
संकल्पार्थपरैरेव संकल्पार्थोऽवगम्यते ॥ १८ ॥
अग्रस्थार्थपरैरग्रे संस्थितोर्थोऽवगम्यते ।
अग्रस्थे बुद्धिसंस्थे यः संकल्पं प्राप्तुमिच्छति ॥ १९ ॥
तदासावेकनिष्ठत्वाभावात्तन्नाशयेद्द्वयम् ।
तस्मादेकार्थनिष्ठत्वाद्भिक्षुजीवेन रुद्रताम् ॥ २० ॥
प्राप्य सर्वात्मना लब्धं तथा सर्वं तथास्थितेः ।
भिक्षुसंकल्पजीवास्ते प्रत्येकं तज्जगत्पृथक् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्पित अर्थ की प्राप्ति मे अभ्यास ओर योग का जो उपयोग है वह चित्त की एकाग्रता के सम्पादन
द्वारा ही है। एकाग्रता न होने पर चित्त अनेक अर्थो मेँ आसक्त होकर किसी एक भी अपने संकल्पित
अर्थ को प्राप्त नहीं कर सकता, यो असत्य संकल्यत्व ही इसमें प्राप्त हुआ।
यह सामने यद्यपि वस्तु उपस्थित है और संकल्पित भी है तथापि एकाग्रता के न रहने से उसे
मैं प्राप्त नहीं कर सकता; क्योकि संकल्पित ओर असंकल्पित दोनों का आश्रय करने से चित्त दोनों
ओर से भ्रष्ट हो जाता है, कहीं एक जगह स्थिर नहीं हो पाता । अभीष्ट सब कार्य एकनिष्ठ पुरुष
को ही प्राप्त होते हैं, अन्यनिष्ठ को नहीं | दक्षिण दिशा की ओर जा रहा कोन पुरुष उत्तर दिशा
को प्राप्त कर सकता है ? संकल्पित अर्थो पर आरूढ़ हुए पुरुष ही संकल्पित अर्थ प्राप्त करते हैं
और सामने स्थित अर्थो को जानते हैँ । जो पुरुष सामने स्थित और बुद्धि में स्थित दोनों वस्तुओं
में संकल्प प्राप्त करने की इच्छा करता है वह एकनिष्ठता न रहने से उस समय उन दोनों का नाश
कर देता है । इसीसे एकनिष्ठा के कारण भिक्षुक जीव ने प्रसिद्ध रुद्र की नाई रुद्ररूपता प्राप्त कर
सब कुछ सर्वात्मरूप से प्राप्त किया, क्योकि इसकी भी स्थिति प्रसिद्ध रुद्र की स्थिति के सदृश ही
थी । वे अट्टानबे मध्यवर्ती जीवट आदि भिक्षुसंकल्परूप जीव प्रत्येक भिन्न-भिन्न रूप से अवस्थित
थे ओर उनका अपना-अपना संसार भी अलग-अलग था, इसलिए वे अपने में रुद्रत्वसामान्य ज्ञान
के बिना एक-दूसरे का साक्षात्कार नहीं कर पाते थे