Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 64, Verses 24–27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 64, verses 24–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 24-27

संस्कृत श्लोक

इत्येकध्यानसाफल्यं दृष्टान्तोऽस्यां क्रियास्थितौ । एकत्वं च बहुत्वं च मौर्ख्यं पाण्डित्यमेव वा ॥ २४ ॥ देवत्वं मानुषत्वं च देशकालक्रियाक्रमैः । तुल्यकालमलं कर्तुं धारणाध्यानयत्नतः ॥ २५ ॥ सर्वशक्त्यः स्वरूपत्वाज्जीवस्यास्त्येकशक्तिता । अनन्तश्चान्तपृक्तश्च स्वभावोऽस्य स्वभावतः ॥ २६ ॥ सविकासः ससंकोचोऽहिंस्रस्तेन चिदात्मनः । यदिच्छति तदस्याङ्ग जन्तुः संपद्यते स्वयम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

रामभद्र, इस रीति से किसी एक वस्तु की तदाकार भावना सफल हो जाती है (यह आपसे मैंने कहा) । दूसरे भी जीवों की प्रसिद्ध तत्‌-तत्‌ व्यवहार स्थिति में यह भिक्षुसंकल्परूप सृष्टि ही दृष्टान्त है देश, काल और क्रिया के क्रम से या एक साथ धारणा, ध्यान एवं प्रयत्न के अनुसार एकत्व, अनेकत्व, मूर्खत्व, पाण्डित्य, देवत्व ओर मनुष्यत्व प्राप्त किया जा सकता है । यतः परमार्थतः अनन्त होने से इस जीव में समग्र शक्तियाँ विद्यमान हैँ ओर यतः एक-एक देहाभिमानरूप परिच्छेद से श्लिष्ट हो जाने के कारण इसमें एक कार्यमात्र की भी शक्ति विद्यमान है, इसलिए शक्तिस्वभाव के अनुसार जीवमें तत्‌-तत्‌ कार्यस्वभाव व्यवस्थित ही हे । इसीलिए प्राणियों के कर्मानुसार स्वर्ग ओर नरक आदि सैकड़ों अर्थ-अनर्थो की सूृष्टिरूप से विकासवान्‌ तथा सब प्राणियों के संहार द्वारा प्रलयरूप से संकोचवान्‌ यह परमात्मा हिंसाजनित विषमता आदि दोषों से शून्य हे, क्योकि जीवसमुदाय स्वयं जिसकी इच्छा करता है इस चिदात्मा के संकल्प से तद्रूप हो जाता है; भद्र, इससे कुछ भी किसीका जगदीश्वर अनिष्ट नहीं करता