Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 64, Verses 34–35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 64, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 34,35
संस्कृत श्लोक
एवं ते भिक्षुसंकल्पा जीवटब्राह्मणादयः ।
रुद्रविज्ञानवशतः स्वसंकल्पपुरीं गताः ॥ ३४ ॥
तत्र भुक्त्वा चिरं भोगान्प्राप्य रुद्रपुरं ततः ।
गणतामावसन्तस्ते स्थास्यन्ति सपरिच्छदाः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी रीति से प्रकृत मे भी जान लेना चाहिए।
इस रीति से भिक्षु के संकल्पस्वरूप जीवट, ब्राह्मण आदि भगवान् रुद्र की अनुमति से अपने
संकल्परूप नगर में चले गये । वर्ह पर चिरकाल तक नानाविध भोगों का उपभोग कर तदनन्तर रुद्रनगरी
प्राप्त करके गणरूप में रहते हुए वे सबके सब परिवारसहित रहने लगे