Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 64, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 64, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
नित्यं प्रफुल्लनवकल्पलतालयेषु रुद्रेण साकमुरुरत्नगुलुच्छकेषु ।
नानाजगत्सु च तदा शिवपत्तनेषु विद्याधरीष्वमरमौलिधराश्च रेजुः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
उस समय उनका भी अपने घर में और सव भुवनो मे अनेक देहों की कल्पना से इच्छानुसार विहार
एक साथ चलता रहा ।
वे सब गण भगवान् रुद्र के साथ अनेक रत्नमय गुच्छों से युक्त विकसित नवीन कल्पलताओं के
घरों मे, अनेक भुवनो मे ओर कैलास, वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक आदि कल्याणमय नगरों मे विहार करते हुए
तथा गीत, वादित्र (वाद्य), नाट्य आदि में कुशल विद्याधरियों के बीच में देवताओं द्वारा नमस्कृत होते
हुए उस समय खूब सुशोभित हुए