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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 65, Verses 1–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 65, verses 1–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 1-8

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । ईषद्दृष्टो यथा तेन भिक्षुणा चेतसि भ्रमः । भूतं प्रयत्नमेवैष पृथक्कृत्वा सुपश्यति ॥ १ ॥ सर्वस्याभासजीवस्य मृतिजन्ममयी स्थितिः । भवत्येव चिदाकाशरूपिण्येवाकृतिं गता ॥ २ ॥ पृथक्कृत्यैक्यमभ्येति स्वात्मा संसारखण्डकम् । सर्व एव मृतो जन्तुः पृथक्स्वप्ननिभात्मकम् ॥ ३ ॥ एवंततस्वरूपोऽपि देही चामोक्षमाकुलः । जीवयूथं मया तुभ्यं कथितं कथयाऽनया ॥ ४ ॥ परात्प्रस्पन्दितात्मेति न भिक्षू राम केवलम् । मोहान्मोहान्तरं याति जीवोऽहरहरेव नः ॥ ५ ॥ पर्वताग्रपरिभ्रष्टो ह्यधोध उपलो यथा । परमात्मपरिभ्रष्टो जीवः स्वप्नमिमं दृढम् ॥ ६ ॥ पश्यत्यस्मादपि स्वप्नाद्याति स्वप्नान्तरं पुनः । स्वप्नात्स्वप्ने विनिपतन्मृषैवेदं दृढं किल ॥ ७ ॥ परिपश्यति जीवोऽन्तर्मायया जर्जरीकृतः । क्वचित्केनचिदेवेह कदाचिदपि वा स्वयम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

चौसठवाँ सर्गे समाप्त पैंसठवाँ सर्ग सम्पूर्ण जीवों में भिक्षुन्याय की समता, रात्रि में भिक्षु का अन्वेषण और सभा का उत्थान -यह वर्णन । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, उस भिक्षु ने अपने चित्त में वर्णित प्रकारवाला जो भ्रम आपाततः विचारा, यह भिक्षु उसी भ्रम को अपने प्राक्तन शुभाशुभरूप प्रयत्न को ही फलावस्था में अपने से पृथक्‌-सा कर स्पष्ट देखता है; अणुमात्र भी दूसरा नहीं हे । प्रतिभासित हो रहे सभी जीवों की मरण एवं जन्ममयी स्थिति, अन्य आकार को प्राप्त हुई-सी, एकमात्र चिदाकाशरूप ही होती हे । इस संसारखण्ड का पुथक्करण कर अपना आत्मा परब्रह्म के साथ एकता प्राप्त करता है ओर पूर्वोक्त रीति से सभी मृत जीव मरणकाल में उद्बुद्ध अपने कर्म को ही स्वप्न के सदृश अपने से पृथक्‌ जगद्रूप से देखते हँ । भिक्षु के आत्मा के सदृश अपरिच्छिन्नस्वरूप भी आत्मा देहपरिच्छिन्न- सा होकर मोक्षपर्यन्त दुःखी रहता है, इस विषय में मैने इस भिक्षु की कथा से आपसे अनेक जीवों का वृत्तान्त कह दिया है । हे श्रीरामजी, सभी जीव पूर्णस्वरूप परमात्मा के प्रस्पन्दनस्वरूप हैं, केवल भिक्षु ही नहीं है । जीव एक मोह से दूसरे मोह को प्राप्त करता है, यह हम लोगों को प्रतिदिन स्वप्न में अनुभवसिद्ध है । परमात्मा से अलग हुआ जीव यह दृढ़ स्वप्न देखता हे । केवल स्वप्न देखता हे, यही बात नहीं, किन्तु इस स्वप्न से भी फिर दूसरे स्वप्न की ओर उस तरह जाता है; जिस तरह पर्वत के अग्रभाग से बिछड़ा हुआ पत्थर का टुकड़ा नीचे की ओर बराबर गिरता ही जाता हे । एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न में गिर रहा जीव असत्यभूत इस स्वप्नात्मक जगत्‌ को भीतर अज्ञान से जर्जर होकर देखता है ओर जन्मादि दुःख का किसी कारणविशेष से किसी भी समय यहाँ कहीं पर स्वयं अनुभव करता है। इन सब बातों से निष्कर्ष यह निकलता है कि देहनामक अहमभिमान ही स्वयं बद्ध और मुक्त होता है यानी उक्त अभिमान ही बन्ध है और स्वात्मलाभ ही मोक्ष है