Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 65, Verses 9–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 65, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
देहनाम्नोऽहमित्यन्तो मुच्यते स्वं प्रपद्यते ।
श्रीराम उवाच ।
अहो नु विषमो मोहो जीवस्यास्योपजायते ॥ ९ ॥
यथा सुप्तस्य स्तोकेन नानाकारविकारया ।
मिथ्याज्ञानोग्रयामिन्या मायया निपतत्यलम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
कुछ पूछने की इच्छा से श्रीरामजी वर्णित अर्थ के परिज्ञान का आश्चर्यपूर्वक स्पष्टीकरण करते हैं ।
श्रीरामजी ने कहा : भगवन्, महान् आश्चर्य है कि इस जीव को विषम मोह होता है। जैसे साधारण
श्रम आदि हेतुओं से सोये हुए पुरुष के मन में स्वप्नमायावश भीषण विषमता (दुःखादि संकट) उत्पन्न
होती है, वैसे ही मिथ्याज्ञानात्मक उग्र रात्रि-रूपी माया से जीव में भयंकर विषमता आ जाती है और
उसको जीव सत्य कहता है, यह महान् आश्चर्य है