Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 66, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 66, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
एवं तेनैव तेनैव संनिवेशेन भूरिशः ।
भविष्यन्त्यभवन्सर्वे पदार्थाः सर्गसंततौ ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यों ब्रह्माण्ड के भेद से जब पदार्थक्रम एक-सा है तब भिश्च भी अनन्त हो सकते है ।
भद्र, उसी प्रकार उसी-उसी अवयवविन्यास से अनेक पदार्थ होगे ओर हो भी चुके हैँ । इस
सृष्टिपरम्परा में इसी क्रम से सब पदार्थ उत्पन्न होते रहते हैं