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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 66, Verses 18–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 66, verses 18–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 66 · श्लोक 18-28

संस्कृत श्लोक

अस्यां सभायामपि ये मुनयो ब्राह्मणास्तथा । भाव्यमेवं समाचौरस्तैरन्यैरप्यनेकशः ॥ १८ ॥ नारदेनामुना भाव्यं पुनरन्येन चामुना । एवं कलनकर्मभ्यां युक्तेनान्येन भूरिशः ॥ १९ ॥ एवं जन्मादिना भाव्यं व्यासेनापि शुकेन च । शौनकेन पुनर्भाव्यं क्रतुना पुलहेन च ॥ २० ॥ अगस्त्येन पुलस्त्येन भृगुणाऽङ्गिरसापि च । एत एव तथान्ये च एवंरूपक्रियास्पदम् ॥ २१ ॥ चिराच्चिराद्भविष्यन्ति मायेयं वितता यतः । सदृशाचारजन्मानस्त एवान्ये च भूरिशः ॥ २२ ॥ भूयोभूयो विवर्तन्ते सर्गेष्वप्स्विव वीचयः । अत्यन्तसदृशाः केचित्केचिदर्धसमक्रमाः ॥ २३ ॥ केचिदीषत्समाः केचिन्न कदाचित्पुनस्तथा । एवमेषातिवितता महतामपि मोहिनी ॥ २४ ॥ क्षणेनेहास्ति नो कर्म प्रतिपत्तिर्हि जृम्भते । क्वैकविंशत्यहोरात्रा अनन्ताकृतयोऽनघ ॥ २५ ॥ क्व तासामुपलम्भोऽलमहो भीमा मनोगतिः । प्रतिभामात्रमेवेदमित्थं विकसितं स्थितम् ॥ २६ ॥ नानाकलहकल्लोलं जले प्रातरिवाम्बुजम् । जातं संवेदनादेव शुद्धादिदमशुद्धिमत् । संसारजालमखिलं सार्चिर्वह्निकणादिव ॥ २७ ॥ प्रत्येकमेवमुदितः प्रतिभासखण्डः खण्डान्तरेष्वपि च तस्य विचित्रखण्डः । सर्वे स्वयं ननु च तेऽपि मिथो न मिथ्या सर्वात्मनि स्फुरति कारणकारणेऽस्मिन् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस अर्थ में मुमुश्चव्यवहारप्रकरणोक्त अर्थ का ही विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। श्रीरामजी, इस सभा में भी जो मुनि और ब्राह्मण हैं वे भी भिक्षु के सदुश आचरणवाले या अपने सदुश आचरणवाले होंगे तथा दूसरे भी अनेक मुनिसदश आचरणवाले या भिक्षुसदृश आचरणवाले होगे । यह भिक्षु आगे चलकर नारद के रूप में हो जायेगा और नारद भी दूसरे के रूप में हो जायेंगे, इस प्रकार ज्ञान और चरित्र से युक्त अन्य के रूप में यह हो जायेगा, यों अनेक तत्‌-तत्‌ रूप में हो जाते है । इसी प्रकार जन्मादि द्वारा व्यास भी होंगे, शुक भी होगे, फिर शोनक भी होगे, क्रतु भी होगे ओर पुलह भी होगे । अगस्त्य, पुलस्त्य, भृगु ओर अंगिरस - ये एवं दूसरे इस प्रकार के स्वरूप ओर क्रिया के आश्रय चिर-चिर काल के अनन्तर होगे, क्योंकि यह माया बड़ी व्यापक है । सृष्टि मेँ सदृश आचार ओर जन्मवाले वे ही और अनेक दूसरे भी बारबार उस प्रकार आते जाते रहते हैं, जिस प्रकार जल में तरंग । कोई तो अत्यन्त सदुश, कोई अर्ध सदृश, कोई स्वल्प सदुश, कोई असदृश पदार्थ किसी समय बारबार उसी रूप में उत्पन्न होते रहते हैं | इस प्रकार यह बड़े-बड़े लोगों को भी मोह में डालनेवाली अति विस्तृत माया ही विलसित हो रही है जो निरवयव कालात्मा में न मानस चेष्टारूप है और न देहचेष्टारूप ही है, क्योकि यह केवल भ्रान्ति ही विलसित हो रही हे । हे पापशून्य, कहाँ इक्कीस अहोरात्र ओर कहाँ अनन्त जीवट आदि आकृतियाँ ओर उनकी उपलब्धियाँ । अहो, यह मनोवृत्ति बड़ी भयंकर है । भद्र, यह जगत्‌ केवल प्रतिभास ही है ओर इस प्रकार विकसित होकर वैसे स्थित है, जैसे प्रातःकाल में जल में कमल । ओर जिस प्रकार उक्त काल में अनेक तरह के भ्रमरो के कलह ओर जलकल्लोल विद्यमान रहते है, उसी प्रकार इस प्रतिभासात्मक जगत्‌ में भी अनेक तरह के जीवकलह ओर विषयानुभवजनित कल्लोल विद्यमान रहते हैं, यह आप देखिए । रामभद्र, जिस प्रकार अग्निकण से अर्चियो से युक्त महान्‌ अग्नि उत्पन्न होता है, उसी प्रकार समस्त अशुद्धियों से निर्मुक्त विशुद्ध संवित्तिरूप परम ब्रह्म से ही अशुद्धात्मक यह सारा संसारजाल उत्पन्न हुआ हे । हे रघुनन्दन, जिस तरह इस भिक्षु के मन में चित्र-विचित्र प्रतिभासात्मक अनेक जगत्खण्ड आविर्भूत हुए, उसी प्रकार प्रत्येक जीव के मन में भी चित्र-विचित्र प्रतिभासात्मक जगत्खण्ड आविर्भूत होते हैं, और उन-उन जीवों के मन में उदित हुए भिन्न-भिन्न जीवांशों मे भी चित्र- विचित्र प्रतिभासात्मक जगत्‌ अन्य-अन्य उत्पन्न होते हैं, इस रीति से उत्तरोत्तर मायालम्पट जीव के लिए जगत्स्थिति कहीं शान्त ही नहीं हो सकती । वे पहले के जगत्‌-खण्ड और उन जगत्‌- खण्डो के अन्तर्गत दूसरे जगत्खण्ड अपनी-अपनी व्यवहार की दृष्टि से सत्यरूप हैं ओर सर्वात्मक चैतन्यस्वरूप, कारणों के भी कारण इस परमात्मतत्त्व के तादात्म्यरूप से प्रस्फुरित होने पर तो सत्यरूप हैं ही नहीं