Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, Verses 28–29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 67, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
ततः स्वप्नो न जागर्तिर्न सुषुप्तिर्न तुर्यता ।
न बन्धोस्ति न मोक्षोस्ति नान्यथाकल्पनात्मकम् ॥ २८ ॥
शान्तिरेका जगन्नाम्नी शान्तिरेवमवस्थिता ।
अबोधोऽसत्य एवातः क्व द्रष्टृदृश्यदर्शनम् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी निःशंकता की सामर्थ्य से जाग्रत् आदि सभी अवस्थाओं के द्वैत का बाध प्रवृत्त हुआ है।
इसी निःशंकता से यह सिद्ध होता है कि परमार्थतः न तो स्वप्न है, न जाग्रत् है, न सुषुप्तिहै, न
तुर्यता है, न बन्ध है, न मोक्ष है ओर न अन्यथाकल्पना स्वरूप जगत् ही है। अज्ञान से ही द्रष्टा, दृश्य
आदि त्रिपुटीरूप जगत् की सत्ता हे । जब वह अज्ञान ही असत्य है तव तो शुद्धात्मस्वरूप वह शान्ति ही
एकमात्र “जगत्” नामवाली है, क्योकि वह शान्ति ही "गच्छति" यानी जो चारों ओर से व्याप्त करती
है - इस व्युत्पत्ति के द्वारा “जगत्” नाम से व्यवस्थित हे । द्रष्टा, दृश्य, दर्शनरूप त्रिपुटी कहाँ है अर्थात्
अत्यन्त अप्रसिद्ध है, इसलिए वह शान्ति “जगत् नामवाली नहीं हो सकती