Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, Verses 12–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 68, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
अस्मत्संस्मरणं वापि दृश्यं वाङ्मयमस्पृशन् ।
अपश्यन्नेव पश्यन् हि काष्ठमौनी तु तिष्ठति ॥ १२ ॥
प्रस्फुरच्चित्तकलनमेतन्मौनत्रयं स्मृतम् ।
भवन्ति मौनिनस्तत्र न तज्ज्ञास्तत्स्थलीलया ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी परिस्थिति मे मलिन मन के दढ निश्वयरूप मौन से युक्त काष्ठतापस समाधि में स्थित कैसे
रहता है ?
भद्र, काष्ठमौनी तो समाधि में बलपूर्वक मनोनिग्रह करके अपने हृदय के अन्दर अहंभाव के
अनुसन्धान का स्पर्श न करता हुआ और बाहर भी रूप एवं नाम प्रपंच का स्पर्श न करता हुआ तथा
अज्ञान से आवृत्त हुए आत्मा का अवलोकन न करके सुषुप्तिवत् अविनाशी आत्मदृष्टि का अभाव
न होने से भर्म से ढकी हुई अग्नि की नाई साक्षिमात्रज्योति से अवलोकन करता हुआ अवस्थित
रहता है। रामभद्र, यह जो तीन प्रकार का मौन कहा गया है वह व्युत्थान काल में प्रस्फुरित हो रहे
चित्त का चलन ही है उस काल में वे ही पूर्वोक्त तीनों मौनी स्थित रहते हैं तथा उसके जाननेवाले
तो चित्त का बाध हो जाने से वहाँ पर स्थित निरोध और व्युत्थानादि की लीला से नहीं ठहर
पाते