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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 68, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

नात्रोपादेयताज्ञानमेतन्मौनत्रये किल । लीलया कथितं तेन तज्ज्ञाः कुप्यन्तु वा न वा ॥ १४ ॥ इदं सुषुप्तमौनं तु जीवन्मुक्तमितिस्थितम् । अपुनर्जन्मनो जन्तोः श्रृणु श्रवणभूषणम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा पूर्णात्मस्थिति की लीला से पूर्वोक्त तीनों मौन बन्धनस्वरूप ही हैं, इसलिए इनका त्याग कर देना चाहिए - इस बुद्धि से वे भले ही करुद्ध हों या वे पूर्वोक्त मौन चिदानन्द के विलास ही हैं, इस बुद्धि से भले ही क्रुद्ध न हों; फिर भी उनमें यहाँ उपादेयताबुद्धि तो है ही नही; यही मेरे कहने का तात्पर्य है - यह कहते हैं । वहाँ की निरोध और व्युत्थानादि की लीला से या पूर्णात्मस्थिति की लीला से तीनों मौन बन्धनस्वरूप होने के कारण त्याज्य हैं, यह जो मैंने कहा है, इससे भले ही तत्स्वरूप का ज्ञान रखनेवाले लोग क्रुद्ध हों या न हों; लेकिन हे श्रीरामचन्द्रजी, इसमें तो तनिक भी सन्देह नहीं है कि इन तीनों मौनों में उपादेयताबुद्धि बिलकुल नहीं है । और भद्र, यह सुषुप्तमौन तो जीवन्मुक्तो के अनुभवपथ में स्थित है। इसमें स्थिति रखनेवाले जन्तु का पुनर्जन्म नहीं होता, इसलिए उसके श्रवण का यह भूषण है । अतः आप भी इसे सुनिये