Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 68, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
नात्र संयम्यते प्राणस्त्रिविधो नापि योज्यते ।
नोल्लस्यन्ते न ग्लायन्ते समस्तेन्द्रियसंविदः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वसाक्षात्कार के सिद्ध हो जाने पर इसकी भी अनायास ही सिद्धि हो जाती है, अतः पूर्वोक्त मौन
में जो क्लेश होता है उसकी इसमें अपेक्षा नहीं है, यह कहते हैं।
इस सुषुप्तमौन में न तो तीन तरह के प्राणों का संयमन (निरोध) किया जाता है और न
संयोजन । इसमें सम्पूर्ण इन्द्रियसंवित्तियाँ न तो अपने विषयों के लाभ से उत्पन्न हर्ष से उल्लसित
होती हैं और न निरोधजन्य क्लेश से ग्लानि को ही प्राप्त होती हैं