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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verse 60

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 69, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 60

संस्कृत श्लोक

कश्चिद्विगलिताविद्यः सत्त्वस्थः शान्तवासनः । परं शून्योपमं सद्यो ज्योतिः पश्यति शाम्यति ॥ ६० ॥

हिन्दी अर्थ

सांख्ययोग द्वारा आत्मदर्शन में तत्पर मनुष्य विरले ही हैं, ऐसा कहते है । कोई एक-आध ही-जिसकी अविद्या निवृत्त हो चुकी है, जो स्वभाव में अवस्थित है, जो वासनारहित हो चुका है-परमतत्त्व को, जो अज्ञानियों की दृष्टि में शून्योपम ओर ज्ञानियों की दृष्टि में (00) ज्योतिःस्वरूप है, देखता है ओर तत्काल मुक्त हो जाता हे