Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 69, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
चेतो विगलिताविद्यं सत्त्वशब्देन कथ्यते ।
दग्धसंसारबीजं तन्न ददात्यन्तरं पुनः ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
अव महाराज वस्निष्ठजी स्वयं ही सतत्वशब्द का निर्वचन करते हैं।
जिसमें से अविद्या गल चुकी है, ऐसा विशुद्ध चित्त सत््वशब्द से कहा जाता हे । जिसमें संसारबीज
वासना दग्ध हो गयी है वह चित्त फिर कभी भी ब्रह्मरूपता से विच्छेद नहीं करता