Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
संतता मोहमिहिका कार्यासारविसारिणी ।
यमुना प्रावृषीवैति तिमिरश्यामला चिरम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
मोहवश स्वतः ही काम्य कर्मो में प्रवृत्त हो रहे पुरुषों को पुनः शास्त्र से भी प्रवृत्त कराना उसी प्रकार
अनुचित है, जिस प्रकार स्वतः कुएँ में गिर रहे उन्मत्त या अन्धपुरुष को बलपूर्वक गिराना, इस आशय
को रखकर मोह से स्वतः प्रवृत्ति होती है, यह बतलाते है ।
जैसे स्वतः श्यामल, वर्षाकाल में रज से कलुषित और उसमें भी रात्रि में अन्धकार से अत्यन्त
श्यामरूपता को प्राप्त हुई कालिन्दी स्वतः बहती है वैसे ही प्रवृत्तिरूपी आसारो से (धारासंपात वर्षा से)
विस्तृत हुआ मोहरूपी कुहरा चिरकाल से स्वयं ही बह रहा है यानी पुरुष को अन्ध बनाकर विषयों में
हठात् प्रवृत्त कराता है, यह भाव हे