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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

बद्धजालघनाकाराः कारार्थमिव रज्जवः । दच्छदःसदृशा वाचः प्रतानगहने स्थिताः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

जब अनेक तरह की लक्षिमयाँ अज्ञान की ही विभूतियाँ हैं, तब उक्त लक्षिमयों के उत्पादक काम्य कर्मो में प्रवृत्ति करानेवाले कर्मकाण्ड के वचनो की भी अज्ञानविभूतिरूपता इसलिए सिद्ध ही हो जाती है, इस आशय से कहते है। श्रीरामजी, कर्मकाण्ड की वाणी भी अज्ञान की विभूति ही है । वह (कर्मकाण्ड की वाणी) काम्य कर्मो के विस्ताररूपी जंगल में रहती है, जिस प्रकार लता जालो से घनाकृति रहती है, उस प्रकार यह भी अनेक फलाभिलाषाओं के जालो से घनाकृति (निविडाकार) रहती है । अतएव वे देवता आदि के ऋणो से आक्रान्त कर्मप्रधान जीवों के कारागृह की रक्षार्थ एक प्रकार की रज्जुस्वरूप हे एवं राग ओर चपलता से आक्रान्त ओठ के सदुश हे । गीता में “यामिमां पुष्पितां वाचम्‌ इत्यादि से इसी विषय का स्पष्टीकरण किया गया हे