Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
समुपैति मतिर्दुःखं सुखं च शतशाखताम् ।
दुःखशाखास्तु जायन्ते नानाकर्मफलाः श्रियः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जो बुद्धि
दुःख प्राप्त करती है, जो सुख हजारों शाखाओं के रूपमे विभक्त हो जाता है तथा जो अनेक कर्मफलरूपी
श्रियाँ, जो कि दुःखरूपी शाखाओं से विस्तृत हैं, उत्पन्न होती हैं, वह भी अज्ञान का ही प्रभाव है