Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
मोहमारुतमापीय त्वचा विषमचारिणः ।
स्फुरन्तीहाहयश्चित्राः शीतलाचलदीप्तयः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार परिवर्तमान अज्ञानी जीवों का सर्परूप से वर्णन करते है।
त्रिविध तापों से शून्य अचल ब्रह्म के प्रकाशरूपता को प्राप्त हो रहे जीव इस संसार में एक
तरह के सर्प ही हैं, क्योकि वे मोहरूपी वायु का अपने अन्दर पूरणकर, स्थित तथा फिर-फिर
पृथक् हो जानेवाली नानादेहरूपी त्वचाओं से उपलक्षित होते हुए कुटिलगति से चलते-फिरते हैं ।
यह भी अज्ञान का विलास हे