Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
चिन्तापिशाचोपहता विवेकेन्दूदयं विना ।
तमसेव निरालोका याति यौवनयामिनी ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
उनके द्वारा प्रत्येक जन्म मे प्राप्त किया जानेवाला यौवन भी-मोक्षहेतु विवेक, वैराग्य, श्रवण आदि
में उपयोग न होने के कारण निरर्थक ही है, इस आशय से कहते है ।
चिन्तारूपी पिशाचं से उपहत, विवेकरूषी चन्द्रमा के उदय से शून्य, अतएव अन्धकार की तरह
प्रकाश रहित उनकी यौवनरूपा रात्रि जो निकल जाती है यानी व्यतीत हो जाती है, वह अज्ञान का ही
विलास हे