Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
जिह्वा जर्जरतामेति प्राकृतानुनयज्वरैः ।
पद्मकोटरकोणस्थमपि सूत्रं हिमैरिव ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार उनकी जीभ आदि इन्द्रियाँ भी व्यर्थ और प्रयोजन शून्य हैं, ऐसा दिखलाते है ।
कमल कोटर के कोने में अवस्थित भी सूत्र यानी कमलसूत्र से दढ अवलम्बित भी भीतरी दल
जैसे हिमप्रपातों से जीर्ण-शीर्ण हो जाता है, वैसे ही स्त्री, पुत्र आदि प्राकृत यानी पामर जनों का
क्षोभ निराकरण करने के लिए किये गये अनेक संतापो से जीभ एवं अन्यान्य चक्षु आदि इन्द्रियाँ
जीर्ण-शीर्ण हो जाती हैं, वह भी अज्ञान का विलास है