Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
असंख्यातानि कल्पानि संजातान्यचले पदे ।
जगज्जङ्गलजालानि दग्धानि युगवह्निना ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
अचल
ब्रह्मरूपी पद में उत्पन्न सम्पूर्ण व्यवहारो में समर्थ असंख्य जगतस्वरूप जंगलों के जाल युगान्तरूपी
अग्नि से जो दग्ध हो जाते हैं, वह भी अविद्या का प्रभाव है