Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
कुलशैलफला मेघपक्षपुञ्जाः फलामृजः ।
जायन्ते च म्रियन्ते च ध्रियन्ते च जगत्खगाः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
उपभोग्य ओर महान होने के कारण
जिनके लिए महेन्द्र, मलय आदि कुलपर्वत ही फलस्थानीय हैं; नभो गति ओर आकृति के सादृश्य
से मेच ही जिनके पंख हैं, ऐसे चारों ओर से फलों को बटोरनेवाले जगतरूपी पक्षी (उत्तरायण ओर
दक्षिणायन मार्ग से निरन्तर परिभ्रमण कर रहे जगदात्मक जीवरूपी पक्षी) जो उत्पन्न होते, मृत होते
ओर मरण तक जीवित रहते हैं, वह भी अज्ञान का प्रताप हे । प्रकृत में मूल, मध्य ओर ऊर्ध्वं भाग
में क्रमशः नाग, मर्त्य ओर देवताओं के द्वारा महेन्द्र आदि कुलपर्वत उपभोग्य होने के कारण फलरूप
से उत्प्रेक्षित किये गये हैं । दक्षिणायन मार्ग में धूप्ररूप से ओर अभ्रमेघरूप आदि से ऊर्ध्वगति के
निर्वाहक होने के कारण मेघ पंखों के रूपमे उत्प्रेक्षित किये गये हैं, यह जानना चाहिए