Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
रागद्वेषसमुत्थेन भावाभावमयेन च ।
जरामरणरोगेण जीर्णा जङ्गमजातयः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थावरो में विशेष बतलाने के बाद जगमो में विशेष बतलाते है।
राग-द्वेष से उत्थित सुखदुःखात्मक जरामरणरूपी रोग से समस्त जंगमजाति जीर्ण-शीर्ण हो
गई है