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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

क्षणेनादृश्य एवेदं निगिरत्यखिलं सुखी । सुदुर्लक्ष्यविलः कालव्यालो विपुलभोगवान् ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

स यद्यदेवास॒जत० (उसने जिस जिसका सर्जन किया, उस उसको भक्षण करने के लिए पकड़ लिया) इस श्रुति के अनुसार स्थावर और जंगम सबमें कालभक्ष्यत्व तुल्य ही है, इसे कहते हैं। कभी भी ध्यान में न आनेवाले बिल में रहनेवाला, अतएव अदृश्य, महान फणधारी या प्रचुरभोग करनेवाला कालरूपी सर्प निर्भय होकर यह समस्त जगत क्षणभर में ही निगल जाता है