Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
फलप्रदाश्चरन्तीह शीलिनः श्वभ्रविग्रहाः ।
पयःपटलविश्रान्तत्रैलोक्याम्भोजकोटरे ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
अब तीनों लोको की तीन कमलो के रूप में कल्पना करके उसमें के प्राणियों की भ्रमर, समूह के
रूप में उत्प्रेक्षा करते है।
जलपटल में अवस्थित त्रिलोकीरूपी कमल के कोटर में प्राणीरूपी भ्रमरों की पेटिका (समूह)
बारबार गुंजाध्वनि जो किया करती है, वह भी अविद्या का विलास है। यद्यपि पुराणों में यह प्रसिद्ध है कि
एकमात्र पृथ्वी ही कमल के पत्ते की नाई जल में स्थित है, न कि अन्तरिक्ष या स्वर्गलोक; तथापि
अन्तरिक्ष एवं द्युलोक, त्रिवृतूकृत जल के कार्य होने के कारण, जलभाग में प्रतिष्ठित हैँ ही, यह सूचन
करने के लिए 'पटल' शब्द का उपादान किया गया है