Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
असकृज्जायते नष्टा भूरिविभ्रमकारिणी ।
मग्नमन्यैरथोन्मग्नं भीमे कालमहार्णवे ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
अव काल का महासमुद्र के रूप में वर्णन करते है ।
प्रत्येक कल्परूप क्षण में क्षीण हो जानेवाले ब्रह्माण्डरूप प्रस्फुट बुदुबुद् भयंकर कालरूपी महासमुद्र
में जो उत्पन्न ओर विनष्ट हो जाते हैं, वह भी अविद्या का विलास है