Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verses 53–57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verses 53–57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 53-57
संस्कृत श्लोक
स्वयं दत्वैव दत्वैव भूतभिक्षां जिघृक्षति ।
तिमिरालीककबरी इन्द्वर्कचपलेक्षणा ॥ ५३ ॥
ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिधरागिरिवरादिका ।
ब्रह्मतत्त्वैकपिटका लम्बमानपयोधरा ॥ ५४ ॥
चिच्छक्तिमातृका स्थूला तरला घनचापला ।
तारकाजालदशना संध्यारुणतरा धरा ॥ ५५ ॥
समस्तपद्मिनीहस्ता शतक्रतुपुरानना ।
सप्ताब्धिमुक्तालतिका नीलाम्बरपरीवृता ॥ ५६ ॥
जम्बूद्वीपमहानाभिर्वनश्रीरोमराजिका ।
भूत्वा भूत्वा विनश्यन्ती त्रिलोकीवृद्धकामिनी ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
अब क्रियाओं के फलभूत त्रिलोकी की वृद्धकामिनी के रूप में उत्प्रेक्षा करते हैं।
त्रिलोकी एक तरह से वृद्धकामिनी ही है, वह कैसी है ? स्वरूपाच्छादक तुच्छ अन्धकार ही
उसके केशपाश हैं, चन्द्र और सूर्य ये दो उसके चपल नेत्र हैं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर-ये तीन
उसके आन्तर चेतनात्मक स्वभाव हैं, पृथ्वी, हिमालय आदि श्रेष्ठ पर्वत उसका बाह्य स्थूल देहस्थानीय
जड़ात्मक स्वभाव है । एकमात्र ब्रह्मतत्त्व ही हृदय में विस्फोट के (फोड़े के) सदृश बन्धनों से आवृत
होकर स्थित हुआ नित्य गोपनीय उसका स्तनमण्डल है, चिदाभासरूपा चितिशक्ति ही पोषण
करनेवाली उसकी धात्री है, अतएव वह मोटी-ताजी है, तरल है, मेघ ही उसका चापल्य हे । तारे
ही उसके दाँत हैं, सन्ध्या ही उसके अरुणतर ओष्ठ हैं, समस्त बिसलताएँ ही उसके हाथ हैं, नील
आकाशरूपी उत्तरीय वस्त्र से वह आवृत्त है, जम्बूद्वीप उसकी महानाभि है, वनशोभा उसकी रोमपंक्ति
है । इस प्रकार की त्रिलोकी रूपी महान विभ्रमकारक वृद्ध कामिनी बार-बार उत्पन्न हो होकर जो
नष्ट हो जाती है ओर नष्ट होकर बार-बार जो उत्पन्न होती रहती है, वह भी अज्ञान का
विलास है