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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 70, Verses 5–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 70, verses 5–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 5-11

संस्कृत श्लोक

स वेतालोऽवसत्पूर्वं कस्मिंश्चित्सज्जनास्पदे । बहुबल्युपहारेण नित्यतृप्ततया सुखी ॥ ५ ॥ निर्निमित्तं निरागस्कं पुरोऽप्यभ्यागतं न सः । क्षुधितोऽपि नरं हन्ति सन्तो हि न्यायदर्शकाः ॥ ६ ॥ स कालेनाटवीगेहो जगाम नगरान्तरम् । न्याययुक्त्या जनं भोक्तुं क्षुधा समभिचोदितः ॥ ७ ॥ तत्र प्राप स भूपालं रात्रिचर्याविनिर्गतम् । तमाह घनघोरेण शब्देनोग्रनिशाचरः ॥ ८ ॥ वेताल उवाच । राजँल्लब्धोऽसि भीमेन वेतालेन मयाधुना । क्व गच्छसि विनष्टोऽसि भव भोजनमद्य मे ॥ ९ ॥ राजोवाच । हे रात्रिचर निर्न्याय्यं मां चेदत्सि बलादिह । तत्ते सहस्रधा मूर्धा स्फुटिष्यति न संशयः ॥ १० ॥ वेताल उवाच । न त्वामद्म्यहमन्यायं न्यायोऽयं हि मयोच्यते । राजासि सकलाशाश्च पूरणीयास्त्वयार्थिनाम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

संक्षेपतः प्रतिज्ञात वस्तु का विस्तार करने के लिए पुनः पहले से आरम्भकर कहते हैं । पहले वह वेताल किसी एक सज्जननामक राजा के देश में रहता था। उस किरातराज्य में ककड़ी की नाई राजा द्वारा किये गये अनेक वध्यजनों के बलियों के उपहार से सदा तृप्त होकर किसी प्रकार के विक्षेप के बिना समाधिसुख में चूर रहता था। किसी कारण के बिना सामने आये हुए निरपराधी पुरुष को वह क्षुधित होने पर भी मारता नहीं था, क्योंकि सन्त पुरुष न्याय के ही दर्शक होते हैं। किसी समय की बात है कि जंगल में वध्यजन उसे प्राप्त न हुए। उस समय अरण्यवासी वह वेताल क्षुधा से प्रेरित होकर न्यायप्राप्त मनुष्य का भक्षण करने के लिए नगर के भीतर चला गया। उस नगर में, मध्य रात में दुष्टजनों के परिज्ञान और चोर आदि के विनाश के लिए कर्तव्यार्थ निकला हुआ राजा उसे मिला। उस राजा से यह उग्र निशाचर घनघोर शब्द से कहने लगा । वेताल ने कहा : हे राजन्‌, इस समय मुझ भयंकर वेताल के द्वारा तुम पकड़ लिये गये हो । कहाँ जा रहे हो ? अब तुम मर गये । आज तुम मेरा भोजन बन जाओ | राजा ने कहा : हे निशाचर, यदि यहाँ बलपूर्वक अन्यायमार्ग से मुझे खा जाओगे तो तुम्हारा मस्तक हजारों टुकड़ों मे फट जायेगा, इसमें तनिक भी सन्देह तुम्हें नहीं करना चाहिए । वेताल ने कहा : हे राजन्‌, मैं तुम्हें अन्यायपूर्वक नहीं खाऊँगा, परन्तु तुम्हें मैं यह न्याय बतलाता हूँ कि तुम राजा हो, इसलिए तुम्हें अर्थियों के सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करने चाहिए