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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 73, Verses 1–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 73, verses 1–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 1-8

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति राजमुखाच्छ्रुत्वा वेतालः शान्तिमाययौ । भावितात्मतया तत्र विचारोचितया धिया ॥ १ ॥ उपशान्तमना भूत्वा मत्वैकान्तमनिन्दितम् । बभूवाविचलध्यानी विस्मृत्य विषमां क्षुधाम् ॥ २ ॥ एतद्राम मयोक्तं ते वेतालप्रश्नजालकम् । एवंक्रमेण चिदणौ तेनेदं संस्थितं जगत् ॥ ३ ॥ चिदणोः कोशगं विश्वं विचारेण विलीयते । कायो वेतालकस्येव शिष्यते यत्पदं तु तत् ॥ ४ ॥ संहृत्य सर्वतश्चित्तं स्तिमितेनान्तरात्मना । स्वभावापतितं कुर्वन्निरिच्छं तिष्ठ शान्तधीः ॥ ५ ॥ आकाशविशदं कृत्वा मनसैव मनो मुने । तिष्ठैकशमशान्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ ६ ॥ स्थिरबुद्धिरसंमूढो यथाप्राप्तानुवर्तिनः । राज्ञो भगीरथस्येव दुःसाध्यमपि सिद्ध्यति ॥ ७ ॥ संपूर्णशान्तमनसः परितृप्तवृत्तेर्नित्यं समे सुखमयात्मनि तिष्ठतोऽन्तः । सिद्ध्यन्ति दुर्लभतरा अपि वाञ्छितार्था गङ्गावतार इव सागरखातवस्तु ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, राजा के मुख से उस प्रकार प्रश्नों का समाधान सुनकर वेताल शान्त हो गया, क्योकि विचारदक्ष बुद्धि से उसने अनुमान कर लिया कि राजा में तत्त्वज्ञता विद्यमान है। भद्र, मनोविकारों से निर्मुक्त होकर अनिन्दित आत्मा का मननकर ओर विषयक्षुधा भूलकर वह निश्चल समाधि में निरत हो गया। हे श्रीरामजी, आपको मेने इन वेतालप्रश्नों का दिग्दर्शन कराया । भद्र, राजा द्वारा वर्णित उक्त क्रम से ही चिद्रूपी अणु में यह समस्त जगत्‌ विद्यमान हे । चिद्रूपी अणु के एक कोश में स्थित यह विश्व विचार के द्वारा, बालक द्वारा भ्रान्ति से कल्पित वेतालशरीर की नाई, विलीन हो जाता हे और जो परमार्थभूत पद (७) है, वह बच जाता हे । हे रामजी, अविचल अन्तरात्मा से चित्त को सब विषयों की ओर से हटाकर परमात्मा में प्रतिष्ठित करते हुए शान्तबुद्धि आप निरीह (सर्वविध इच्छाओं से निर्मुक्त) होकर स्थित हो जाइये । हे मननशील रामजी, मन से ही मन को आकाश के सदृश विशद बनाकर एक वस्तु में समस्त वृत्तियों का लयकर उपरतचित्त ओर सर्वत्र ब्रह्मदर्शन से युक्त होकर स्थित हो जाइये । भद्र, निश्चलबुद्धि ओर मूढता से शून्य होकर आप स्थिर रहिये । देहयात्रार्थ प्रारब्धवश प्राप्त हुए अर्थ से सन्तुष्ट (&) रहनेवाले प्रयत्नशील पुरुष के लिए, भगीरथ राजा की नाई, दुःसाध्य अर्थ भी प्राप्त हो जाते हैं । भद्र, जिसका पूर्णरूप से मन शान्त हो गया है, जिसकी वृत्तियाँ पर्याप्तरूप से तृप्त हो गयी हैं, जिसकी आनन्दघनस्वरूप सम ब्रह्म मे निरन्तर निष्ठा है, उस महापुरुष को आखिर में दुर्लभतर भी अभीष्ट अर्थ उस प्रकार सिद्ध होते हैं, जिस प्रकार शान्ति आदि गुणविशिष्ट भगीरथ को सगरपुत्रों के लिए और समुद्र के लिए संजीवनमणिप्राय गंगाअवतरणरूप अत्यन्त दुर्लभ अर्थ सिद्ध हुआ

सर्ग सन्दर्भ

बहत्तरवाँ सर्ग समाप्त तिहत्तरवाँ सर्ग॑ वेताल के प्रश्नों का निर्णय देकर दूसरे भगीरथ के वृत्तान्त का कथन |