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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 76, Verses 12–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 76, verses 12–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 12-17

संस्कृत श्लोक

तदा किल स्वर्गनदी वहति स्म न भूतले । पितॄणां भूतविख्योऽभूत्तेन गङ्गाजलाञ्जलिः ॥ १२ ॥ भगीरथेन च महीमवतारयितुं दिवः । गङ्गां गृहीतो नियमस्ततःप्रभृति भूभृता ॥ १३ ॥ ततो राज्यं परित्यज्य मन्त्रिणां भूपतिः शमी । तपसे कार्यकार्येहो जगाम विजनं वनम् ॥ १४ ॥ तत्र वर्षसहस्रैश्च समाराध्य पुनःपुनः । ब्रह्माणं शंकरं जह्नुं भुवि गङ्गामयोजयत् ॥ १५ ॥ ततः प्रभृत्यमलतरङ्गभङ्गिनी जगत्पतेः शशिविभृदङ्गसङ्गिनी । नभस्तलान्निपतति गां त्रिमार्गगा महात्मनामिव बहुपुण्यसंततिः ॥ १६ ॥ स्फुरत्तरङ्गभङ्गिनी स्वफेनपुञ्जहासिनी प्रसन्नपुण्यमञ्जरीयुतेव धर्मसंततिः । भगीरथे महीपतौ यशःप्रचारवीथिका तदा हि सा त्रिमार्गगा महीतले बभूव ह ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

उस समय भूतल पर गंगाजी तो थीं ही, फिर वहीं पर पितामहो को जलाजलि उसने क्यो नहीं दी, ऐसी आशंका कर कहते है। भद्र, उस समय इस भूतल पर गंगाजी नहीं बहती थीं । इसीलिए भगीरथ द्वारा ही दूसरों के पितरों के लिए भी गंगाजल की अंजलि देना प्रसिद्ध हो गया । उक्त जनश्रुति जिस दिन उसके कान में आई, उसी दिन से पृथिवीपालक राजा भगीरथ ने गंगाजी को स्वर्ग से पृथिवी पर लाने के लिए कठोर नियम धारण किया । तदनन्तर भूतल पर गंगाजी को लाने के लिए कठोरतम उपाय का अवलम्बन करने के लिए चेष्टा रखनेवाला जितेन्द्रिय पृथिवीपति भगीरथ मन्त्रियों के सिरपर समस्त राज्यभार छोडकर तप के लिए निर्जन अरण्य में चला गया । उस निर्जन अरण्य में हजार वर्ष तक ब्रह्माजी, शंकरजी ओर जह की बार-बार आराधना कर उसने इस पृथिवीतल पर गंगाजी का सम्बन्ध कराया | तवसे लेकर यह पुण्यतोया त्रिपथगा गंगाजी, जो निर्मल तरंगमाला ओं से रंजित, जगत्पति शशिभूषण शिवजी के मस्तक में सुशोभित तथा स्वर्गवासियों की बडी पुण्यसन्ततिरूपा है आकाशतल से पृथिवी पर गिरती हे । चंचल तरंगमालाओं से सुशोभित, अपने फेनपुंजरूप हास से युक्त, प्रसन्नपुण्यरूपा मंजरी से समन्वित तथा धर्म की सन्ततिस्वरूप यह त्रिमार्गगामिनी गंगा उसी समय से लेकर इस पृथिवीपर पृथिवीपति भगीरथ के लिए समुद्रपर्यन्त कीर्ति प्रसारार्थ एकतरह की वीथिका ही बन गयी हैं