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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 76, Verses 6–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 76, verses 6–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 6-11

संस्कृत श्लोक

तत्र तं पालयन्तं तद्राज्यं राजानमादृताः । आजग्मुः प्राक्प्रकृतयः प्राहुरित्थं नृपाधिपम् ॥ ६ ॥ प्रकृतय ऊचुः । राजन्नस्माकमधिपो यस्त्वया स पुरस्कृतः । मृत्युना विनिगीर्णोऽसौ मत्स्येनेवामिषं मृदु ॥ ७ ॥ तत्तत्पालयितुं राज्यं प्रसादं कर्तुमर्हसि । अप्रार्थितोपयातानां त्यागोऽर्थानां च नोचितः ॥ ८ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । इति संप्रार्थितो राजा तदङ्गीकृत्य तद्वचः । सप्तसागरचिह्नायाः स बभूव भुवः पतिः ॥ ९ ॥ समः शान्तमना मौनी वीतरागो विमत्सरः । प्राप्तकार्यैककरणः स तिरोहितविस्मय ॥ १० ॥ पातालतलनष्टानां सागराकारकारिणाम् । पितामहानां गङ्गाम्बु शुश्रुवे तारणक्षमम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी समय दैववश कोशलराज्य का अपहरण करनेवाला राजा भी मर गया, इसलिए अयोध्यावासी जन भी भगीरथ के पास आकर प्रार्थना करने लगे, यह कहते है। वहाँ पर उस राज्य का परिपालन कर रहे राजा भगीरथ के पास आदरयुक्त पहले के अयोध्यावासी मन्त्री, पुरोहित आदि प्रकृतिर्या आई ओर राजाधिराज से यों कहने लगीं । प्रकृतियों ने कहा : राजन्‌, राज्य छोड़ते समय आपने सीमा की समाप्ति में स्थित अपने शत्रु राजा को राज्यदान से पुरस्कृत किया था उसे मृत्यु ने उस प्रकार निगल लिया, जिस प्रकार कोमल छोटे मत्स्य को महामत्स्य निगल जाता है। हे महाराज, इस कारण से अपने पूर्व राज्य की रक्षा करने के लिए आप दया कीजिये। बिना अभिलाषा के प्राप्त हुए अर्थो का त्याग करना उचित नहीं हे । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इस प्रकार प्रकृतिवर्ग से भलीभाँति प्रार्थित हुआ राजा भगीरथ उनके वचन तथा उक्त राज्य का अंगीकार कर सात समुद्रो के चिन्हों से युक्त पृथिवी का स्वामी हुआ । वह सर्वत्र समभाव रखता था। उसके मन में शान्ति विराज रही थी । उसकी मित, हित और सत्य वाणी थी | उसकी समस्त विषयों से प्रीति हट गयी थी । उसमें मत्सर का तो नाम-निशान नहीं था । प्राप्त हुए कार्यो को एकमात्र कर डालना ही उसका स्वभाव था। बड़े-बड़े कौतुकपूर्ण अर्थो में उसे तत्त्वज्ञान के कारण कभी आश्चर्यबुद्धि होती ही नहीं थी । अश्व का अन्वेषण करने के लिए भूमि खोदकर सागर के सदृश गर्त निर्माण करने का जिनका स्वभाव था ओर जो कपिल के उद्वाम क्रोधाग्नि से पातल तल में भस्मीभूत हो चुके थे ऐसे अपने पितामहो का तारण करने में गंगाजल ही स्नान और जलांजलिप्रदान द्वारा समर्थ हे, प्राकृत नहीं, यों उसने जनपरम्परा से ता्यवचन सुना