Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 79, Verses 6–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 79, verses 6–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 6-20
संस्कृत श्लोक
यथायमागतः कश्चिज्जागतः स्पन्दविभ्रमः ।
तथा विलीयते सर्वं तत्त्वज्ञानवति स्वयम् ॥ ६ ॥
अदृष्टसकले शान्ते पदे विश्रान्तिमेत्य सा ।
रराज शरदच्छाभ्रमालेव गतसंभ्रमा ॥ ७ ॥
अनाकुला समालोकमसंबन्धात्मनात्मनि ।
जरद्गवीव शैलाग्रं सतृणं प्राप्य संस्थिता ॥ ८ ॥
स्वविवेकघनाभ्यासवशादात्मोदयेन सा ।
शुशुभे शोभना पुष्पलतेवाभिनवोद्गता ॥ ९ ॥
अथ तामनवद्याङ्गीं कदाचित्स शिखिध्वजः ।
अपूर्वशोभामालोक्य स्मयमान उवाच ह ॥ १० ॥
भूयो यौवनयुक्तेव मण्डितेव पुनःपुनः ।
अधिकं राजसे तन्वि जगद्राजवती यथा ॥ ११ ॥
प्रपीतामृतसारेव लब्धा लभ्यपदेव च ।
आनन्दापूरपूर्णेव राजसे नितरां प्रिये ॥ १२ ॥
उपशान्तं च कान्तं च दधाना सुन्दरं वपुः ।
अभिभूयेन्दुमायासि श्रियं कामपि कामिनि ॥ १३ ॥
अभोगकृपणं शान्तमूर्जितं समतां गतम् ।
गम्भीरं च प्रशान्तं च चेतः पश्यामि ते प्रिये ॥ १४ ॥
तृणीकृत्य त्रिभुवनं पीताखिलजगद्रसम् ।
अनन्तोड्डामरं सौम्यं मनः पश्यामि ते प्रिये ॥ १५ ॥
न केनचिन्महाभागे विभवानन्दवस्तुना ।
चेतस्तव तुलामेति मरुक्षीराब्धिसुन्दरम् ॥ १६ ॥
तैरेव बालकदलीमृणालाङ्कुरकोमलैः ।
अङ्गैः स्थितिमनुप्राप्तैर्वृद्धिं यातेव लक्ष्यसे ॥ १७ ॥
तथा तेनैव तेनैव संनिवेशेन संस्थिता ।
अन्यतामुपयातासि लतेव ऋतुपर्यये ॥ १८ ॥
किं त्वया पीतममृतं प्राप्तं साम्राज्यमेव वा ।
अमृत्युमेव संप्राप्ता प्रयोगायोगयुक्तितः ॥ १९ ॥
राज्याच्चिन्तामणेर्वापि त्रैलोक्याद्वा त्वयाधिकम् ।
अप्राप्तं किमनुप्राप्तं नीलोत्पलविलोचने ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
आविर्भाव से वह नवीन उत्पन्न सुन्दर पुष्पलता के सदुश शोभने लगी । अनन्तर किसी एक समय
उस पूतांगी अपूर्वशोभासम्पन्न चूडाला को देखकर विस्मय से प्रसन्नवदन वह शिखिध्वज कहने
लगा । हे तन्वि, इस समय तुम पुनः यौवनयुक्त-सी तथा पुनः पुनः आभूषणं से भूषित-सी होकर
उस प्रकार अधिक शोभ रही हो, जिस प्रकार पूर्णचन्द्र से युक्त पृथिवी । हे प्रिये, इस समय तुम ऐसे
परिपूर्णरूप से शोभित हो रही हो, जैसे कि मानों तुमने अमृत का सार पी लिया हो या अलभ्य पद
की ही तुमने प्राप्ति कर ली हो । आनन्दप्रवाह से तुम परिपूर्णं हो गयी हो । हे कामिनि, शान्तिसम्पन्न
तथा कान्तिपूर्ण सुन्दर शरीर धारण कर रही तुम चन्द्रमा का भी तिरस्कार कर किसी अपूर्वं शोभा
की ओर जा रही हो हे प्रिये, इस समय भोग के कार्पण्य से रहित, शान्त, विवेक से बलिष्ठ, समता
को प्राप्त, गम्भीर ओर चंचलतारहित तुम्हारा चित्त मैं देख रहा हं हे प्रिये, त्रिभुवन को तृण बना
करके जगत्रसायन का पान करनेवाला, अनन्त, उच्चतायुक्त तथा सौम्य तुम्हारा मन मैं देखता हूँ।
हे महाभागे, मरु ओर क्षीरसागर के सदृश सुन्दर तुम्हारा मन किसी भी विभावानन्द की वस्तु से
उपमा को प्राप्त नहीं होता । हे बाले, अचपलता को प्राप्त हुए उन्हीं पूर्वोक्त अवयवो से, जो
बालकदली, मृणाल एवं बालांकुर के सदृश कोमल हैं, तेज की अधिकता से मानों वृद्धिगत हो गयी
हो | शिशिर ऋतु का अतिक्रमण हो जाने पर जिस प्रकार लता प्राक्तन अवयवो से युक्त होती हुई
भी अन्यरूप हो जाती है उसी प्रकार उन-उन प्राक्तन अवयवों से अवस्थित होती हुई भी तुम
अन्यरूप हो गयी हो । भद्रे, क्या तुमने अमृत तो नहीं पी लिया है या किसी साम्राज्य की ही तो प्राप्ति
नहीं कर ली है या रसायन आदि के प्रयोग तथा मन्त्र आदि की सिद्धि, राजयोग आदि उपायो से क्या
अमृत्यु का ही तो लाभ नहीं कर लिया है ? हे नीलकमल के सदृश नेत्रवाली, क्या तुमने राज्य,
चिन्तामणि ओर त्रैलोक्य से भी ऊँचा कोई अप्राप्त पदार्थ तो प्राप्त नहीं कर लिया है