Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, Verses 10–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 8, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
जायमानप्रवालाढ्या संजाताङ्कुरदन्तुरा ।
सर्वर्तुकुसुमोपेता समग्ररसशालिनी ॥ १० ॥
जन्मपर्वाहिनीरन्ध्रा विनाशच्छिद्रचञ्चुरा ।
भोगाभोगरसापूर्णा विचारैकघुणक्षता ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्पन्न होनेवाले मित्र, पशु आदि पल्लवो से पूर्ण, उत्पन्न
हुए पुत्र, पौत्र आदि अंकुरों से दन्तुर (आनन्द से किचिंत हास्ययुक्त मुखवाली), सब ऋतुरूप पुष्पों से
शोभित तथा सम्पूर्ण प्रकारो के रसां से युक्त है । जन्मरूपी पर्वो में दुःख, रोग आदिरूप सर्पो से
छिद्ररहित यानी भरी हुई, मरणरूप शाखाओं के सन्धिभूत छिद्रों मेँ हठात् विदीर्यमाण होने से व्याकुल,
विषयानूभव से उत्पन्न रागादि मकरन्दो से अर्थात् पुष्परसों से युक्त यह लता केवल विचाररूप घुन से
नष्ट हो जाती हे