Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 8, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
आगत्यागत्य पतति विवेककरिणीं क्वचित् ।
विधूयते धूतरजाः प्रसक्तिं पुनरेति च ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्मरूप वायु के द्वारा पुनः-पुनः भ्रमित होकर यह सृष्टिलता कहींपर यानी किसी अधिकारी प्राणीरूप
पल्लवभाग में स्थित विवेकरूप हथिनी के ऊपर गिर जाती है । तदनन्तर उस हथिनी द्वारा कभी
विचाररूप सूँड़ के अग्रभाग से वह लता अपने आश्रयभूत विषयरूप वृक्ष से अलगकर कंपाई जाती है ।
इस स्थिति में दुर्वासना रूप धूलि के नष्ट हो जाने पर भी यदि दैवात् सूंड से वह छूट जाती हे, तो पुनः
उसी विषयरूपी वृक्ष से लिपट जाती है