Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 8, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
स्फीतेऽन्तर्गलिता तस्य अज्ञेऽन्तः संस्थितान्विता ।
इतो जलमितः शैला इतो नागाः सुरा इतः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
कार्यअविद्या के स्वरूप का विचार करनेवाले तत्ववित् के प्रकाशमान पूर्ण आत्मा में वह
अन्तःविलीन यानी बाधित हो जाती है ओर अज्ञानी पुरुष में तो भीतर चारों ओर से अनुवृत्त होकर
अवस्थित रहती हे । (इस अनुवृत्ति का विस्तारपूर्वक निरूपण करते हैं - इतः“ इत्यादि से ।) कहीं
तो यह सृष्टिरूपा लता के समीप कहीं जल है, कहीं पर्वत है, कहीं तो नागों से युक्त है और कहीं
देवताओं से सुशोभित हे