Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
सन्मतेर्विदुषो ज्ञस्य सर्वमात्ममयं यदा ।
त्रय एते तदा पक्षाः संभवन्ति न केचन ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
ये तीनों साध्यभेद अज्ञानियों के लिए ही हैं, यह कहते हैं।
सन्मति तत्त्वज्ञ विद्वान् की दृष्टि में जब यह सब आत्मस्वरूप हो जाता है तब इन तीनों पक्षों में से
कोई भी पक्ष नहीं ठहरता