Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
केवलं सर्वमेवेदं कदाचिल्लीलया तया ।
उपेक्षापक्षनिक्षिप्तमालोकयति वा न वा ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी के लिए यदि तीसरा विकल्प मान भी लिया जाय, तो भी कोई दोष नहीं होता, इस आशय से
कहते हैं।
(&) ग्रहणबुद्धि की विषयभूत वस्तु उपादेय है, यह प्रवृत्ति की विषय है । त्यागबुद्धि की विषय वस्तु
हेय कहलाती है, यह निवृत्ति की विषय है । उपेक्षाबुद्धि की विषय वस्तु उपेक्ष्य है ।
किसी समय ज्ञानी उस लीला से ही इस समस्त जगत् को उपेक्षापक्ष में रखकर केवल देखता है
और नहीं भी देखता है