Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
ज्ञस्योपेक्षात्मकं नाम मूढस्यादेयतां गतम् ।
हेयं स्फारविरागस्य श्रृणु सिद्धिक्रमः कथम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
एक ही वस्तु एक पुरुष के बोध, राग ओर वैराग्य अवस्था के भेद से तीन प्रकार की हो जाती
है, ऐसा कहते हैँ ।
एक ही वस्तु ज्ञानी की दृष्टि में उपेक्षात्मक, मूढ की दृष्टि मेँ उपादेयात्मक और उत्तमवेराम्यसम्पन्न
पुरुष की दृष्टि मेँ हेयात्मक हो जाती हे । हे रामभद्र, आकाशगमनसिद्धि आदि का क्रम कैसा है, उसे
आप अब सुनिये