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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 41–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verses 41–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 41,42

संस्कृत श्लोक

तस्यास्त्वभ्यन्तरे तस्मिन्कदलीकोशकोमले । या परा शक्तिः स्फुरति वीणावेगलसद्गतिः ॥ ४१ ॥ सा चोक्ता कुण्डलीनाम्ना कुण्डलाकारवाहिनी । प्राणिनां परमा शक्तिः सर्वशक्तिजवप्रदा ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके मूल में साढ़े तीन वलय के आकार से युक्त कुण्डलिनी संज्ञावाली चित्‌शक्ति है । उसके आभ्यन्तर में यानी कदलीकोश के सदृश मूलाधार में वीणा के मूल में दुर्लक्ष्य तारों के वेग से विलास कर रही-सी परम-सूक्ष्म पराशक्ति नाम की सकल शब्दों की मूलभूत शब्दब्रह्मात्मिका जो स्फूर्ति है वही प्राणसंग से नाभि, हृदय ओर कण्ठ प्रदेशों में उतरोत्तर को अत्यन्त व्यक्त होकर देखती हुई मध्यमा, वैखरी इत्यादि भेदो को प्राप्त करती है (5) । चूँकि वह कुण्डलाकारवाहिनी है, इसलिए कुण्डलिनी नाम से कही गयी है । वह सब प्राणियों की परमाशक्ति है तथा प्राण, इन्द्रिय, बुद्धि आदि सब शक्तियों की सत्तास्फूर्ति की प्रवृत्ति में निर्वाहक होने से वेगप्रदान करनेवाली है