Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 38–40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verses 38–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 38-40
संस्कृत श्लोक
देवासुरमनुष्येषु मृगनक्रखगादिषु ।
कीटादिष्वब्जजान्तेषु सर्वेषु प्राणिषूदिता ॥ ३८ ॥
शीतार्तसुप्तभोगीन्द्रभोगवद्बद्धमण्डला ।
सिता कल्पाग्निविगलदिन्दुवद्बद्धकुण्डली ॥ ३९ ॥
ऊरोर्भ्रूमध्यरन्ध्राणि स्पृशन्ती वृत्तिचञ्चला ।
अनारतं च सस्पन्दा पवमानेन तिष्ठति ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
यह केवल मनुष्यों के ही शरीर में होती हो, यह बात नहीं है, किन्तु सभी जीवो के शरीरो में यह
एक-सी होती है, यह कहते हैं।
है श्रीरामजी, देव, असुर, मनुष्य, मृग, मगर, खग आदि में, कीट, पतंग आदि से लेकर
ब्रह्मापर्यन्त सब प्रकार के प्राणियों में वह नाडी उदित है शीतजन्य पीड़ा के निवारण के लिए गेंडुरी
मारकर (गोलाई बोधकर) सोये हुए सर्पराज के शरीर की नाई बद्धमण्डल, शुभ्र तथा प्रलयाग्नि से
गल रहे चन्द्रमा के तुल्य बद्धकुण्डली वह नाडी है । गुदा से लेकर भौंह के बीच तक सब छिठद्रों का
स्पर्श कर रही वह सुषुम्ना नाडी मन की वृत्तियों से भीतर चंचल और बाहर प्राणादि से स्पन्दयुक्त
होकर सदा अवस्थित रहती हे