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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

वीणाग्रावर्तसदृशी सलिलावर्तसंनिभा । लिप्यार्धौकारसंस्थाना कुण्डलावर्तसंस्थिता ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

मूलाधार में स्वान्तर्गत कुण्डलिनी के स्थान की अनुकूलता से उसका वर्णन करते हैं । वीणादण्ड के मूलभाग में प्रसिद्ध रेखास्वरूप आवर्त के (तन्त्री के मूल में परिवर्तनरूप जो आवर्त होता है उसके तुल्य अथवा जलपरिवर्तनस्वरूप जो आवर्त होता है) उसके तुल्य, द्रविडाक्षर में लिखकर देखने में ॐकार के पूर्वार्द्धके समान और नागरी लिपि में तो ॐकार के उत्तरार्द्ध के समान तथा कुण्डल एवं आवर्त के तुल्य वह सुषुम्ना नाडी स्थित है