Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
परिमण्डलिताकारा मर्मस्थानं समाश्रिता ।
आन्त्रवेष्टनिका नाम नाडी नाडीशताश्रिता ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
अब, देहस्थ वायु के अपने अधीन हो जाने से सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है, यह जो कहा
गया, इसका उपपादन करने के लिए सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई बहत्तर हजार शाखाओवाली प्रधान सौ
नाड़ियों की आश्रित, मूलाधार से लेकर ब्रह्मरन्प्रपर्यन्त सात चक्रो मे प्रविष्ट होकर निकली हुई तथा
मूलाधार में साढ़े तीन वलय के वेष्टन के भीतर सोई हुई कुण्डलिनी की शक्ति से सम्पन्न सुषुम्ना नाडी
का वर्णन करते हैं।
चारो ओर से फैली हुई शाखाओं से परिवेष्टित होने के कारण मण्डलित आकार से युक्त, मर्मस्थान
में समाश्रित, सौ नाडियों की आश्रय आन्त्रवेष्टनिका (सुषुम्ना) नाम की नाडी है (चूँकि आँतों की
नाडियों से वह बिलकुल घिरी हुई है, इसलिए उसका नाम आन्त्रवेष्टनिका पड़ा है)