Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
यदा प्राणानिलो याति हृदि कुण्डलिनीपदम् ।
तदा संविदुदेत्यन्तर्भूततन्मात्रबीजभूः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
बुदिशक्ति को वेगप्रदान कनेवाली कैसे है, यह कहते है ।
जब हृदय में स्थित प्राणवायु कुण्डलिनी से आकृष्ट होकर अपानवृत्ति द्वारा कुण्डलिनी पद को
प्राप्त होता है तब अपंचीकृत भूतो से जनित अन्तःकरण में विद्यमान जीवसंवित् स्मृति, संकल्प,
अध्यवसाय, अभिमान, राग आदि वृत्तियों के भेदो से अन्दर उदित होती हे