Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
यथा कुण्डलिनी देहे स्फुरत्यब्ज इवालिनी ।
तथा संविदुदेत्यन्तर्मृदुस्पर्शवशोदया ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे इन्द्रियशक्ति को वेगप्रदान करती है, यह बतलाते है।
इस तरह प्राण और बुद्धि को ज्ञान और क्रिया शक्ति प्रदान करनेवाली कुण्डलिनी कोमल स्पर्शवाली
(विषय सन्निकर्षवाली) चक्षु आदि इन्द्रियों से उदय प्राप्त करती हुई, कमल में भ्रमर की नाई, देह में जेसे-
जैसे (जिस तरह के भोजक के अदृष्ट या दृष्ट सामग्री के वैचित्र्य से) स्फुरित होती है वैसे-वैसे अन्तःकरण
में तत्-तत् इन्द्रियों से अर्थविशेषों मे स्फूर्तिस्वरूप तत्-तत् फलभोगादिरूप संवित् उदित होती हे