Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
स्पर्शनं मृदुनान्योन्यालिङ्गिका तत्र यन्त्रयोः ।
यथा संविदुदेत्युच्चैस्तथा कुण्डलिनी जवात् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे वह इन्द्रियसन्निकर्षों की वशवर्तिनी है, यह कहते हैं।
ज्यों-ज्यों चक्षु आदि इन्द्रियों के साथ विषयस्पर्श प्रथम उत्पन्न होता जाता है त्यों-त्यों
कार्यकरणसंघातरूप यन्त्र के प्रेरक वृत्ति द्वारा बाहर निकले हुए प्रमाता की बाह्य विषयों के साथ परस्पर
(<~) ऐसा ही मन्त्रशास्त्र मेँ कहा गया है :
चैतन्यसर्वभूतानां शब्दब्रह्मेति यद्विदुः । तत्प्राप्य कुण्डलीरूपं प्राणिनां देहमध्यगम् ॥
वर्णात्मनाऽऽविर्भवति गद्यपद्यादिभेदतः ॥* इत्यादि ।
साम्ब ने भी कहा है :
या स. मित्रावरुणसदनादुच्चरन्ती त्रिषष्टिं वर्णानत्र प्रकटकरणैः प्राणसंगात् प्रसूते ।
तां पश्यन्तीं प्रथममुदितं मध्यमां बुद्धिसंस्थां वाचं वक्त्रे करणविशदां वैखरीं च प्रपद्ये ॥
आलिंगन करानेवाली संवित् कुण्डलिनी अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है