Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
चेतनाचेतनं भूतजातं व्योम तथाखिलम् ।
सर्वं चिन्मात्रसन्मात्रं शून्यमात्रं यथा नभः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थूल और सूक्ष्म भूतो के अध्यास का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के लिए उपोद्धात द्वारा सवके
अधिष्ठान, सच्विदेकरस, समस्त प्रपच और उसके धर्मो से शून्य उस आत्मतत्व का सबसे पहले
निर्देश करते हैं।
जैसे आकाश शून्यमात्र है वैसे ही यह सम्पूर्ण चेतन और अचेतन भूतों का समूह तथा आकाश जो
कुछ भी भासता है वह सब असंग, विभु और सूक्ष्म चिन्मात्र ही है