Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 55–58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verses 55–58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 55-58
संस्कृत श्लोक
तद्धि चिन्मात्रसन्मात्रमविकारं स्वनामयम् ।
क्वचित्स्थितं संविदेव भूततन्मात्रपञ्चकम् ॥ ५५ ॥
तत्पञ्चधा गतं द्वित्वं लक्षसे त्वं स्वसंविदम् ।
अन्तर्भूतविकारादि दीपाद्दीपशतं यथा ॥ ५६ ॥
स्वसत्तामात्रकेणैव संकल्पलवरूपिणा ।
पञ्चकानि व्रजन्तीह देहत्वं तानि कानिचित् ॥ ५७ ॥
कानिचित्तिर्यगादित्वं हेमादित्वं च कानिचित् ।
कानिचिद्देशतादित्वं द्रव्यादित्वं च कानिचित् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
उस चिन्मात्र के उसी तरह से स्थित रहनेपर माया द्वारा कल्पित एक देश में आकाशादि सूक्ष्म भूतों
का अध्यास होने से वही भूततन्मात्ररूप से अवस्थित है, यह कहते हैं।
वह सन्मात्र, चिन्मात्र, विकारशून्य ओर अनामय संवित् ही कहीं माया द्वारा कल्पित एक देश
में भूत ओर पंचतन्मात्राओं के रूप से अवस्थित है । प्राण, मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय ओर कर्मेन्द्रिय
इस पंचप्रकार को प्राप्त लिंगशरीर में प्रतिविम्बरूप से प्रवेश करके सम्पन्न हुए हे श्रीरामचन्द्रजी,
जन्मादि विकार तथा जाग्रदादि अवस्थाओं के भेद जिसमें अन्तर्भूत हैं ऐसे स्वसंविद्रूप जीवभाव को
आप उस तरह लक्षित करते हैं, जिस तरह एक दीप से सौ दीप । लिंगारम्भ से कुछ ऐसे भी
तन्मात्रपंचक हैं, जो इस संसार में देवमनुष्यादि आकार की वासनाओं के अनुसार कुछ संकल्पस्वरूप
अपनी सत्तामात्र से ही केवल पंचीकरण द्वारा स्थूल देहभाव को प्राप्त होते हैं | कोई तन्मात्रपंचक
पशु-पक्षी आदि तिर्यग्देहभाव को प्राप्त होते हैं; कोई सुवर्ण, रजत ओर खप्पर से उपलक्षित
ब्रह्माण्डभाव तथा उसके अन्तर्गत भुवनादिभोग्यभाव को प्राप्त होते है, कोई देशादिभाव को और
कोई द्रव्यादिभाव को प्राप्त होते हें